कौन सा ग्रह किस रोग का कारन बनता है . planets and health astrology

मित्रो आज हम बात करेंगे ज्योतिष अनुसार  कौन सा ग्रह किस रोग का कारन बनता है .
जातक की कुंडली में जो गृह मारक ,पीड़ित और शत्रु से दृष्ट होते है ,वे नीचे  बताये गए रोगों का कारन बन सकते है
पीड़ित या मारक ग्रह की दशा अंतर् दशा ,प्रत्यंतर दशा  शुक्षम दशा में  व्यक्ति को उस ग्रह  से सम्बंधित रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है . ऐसे ग्रह जिस भाव पर दृष्टि डालते है उस  भाव से सम्बंधित रोगो का विचार भी किया जाना चाहिए

सूर्य –  अगर जातक की कुंडली में सूर्य . मारक . पीड़ित  या शत्रु की राशि  में बैठा हो ,6 .भाव में बैठा हो तो   उसे सर दर्द , आधी  सीसी , दिल से सम्बंधित रोग . हड्डीओं से सम्बंधित रोग ,  रिड की हड्डी के रोग , अतिसार .बुखार , आँखों के विकार .और चार्म रोग भिओ हो सकते है . रक्तविकार हो सकते है .

चंद्र  – अगर पीड़ित है तो नींद की कमी अनिद्रा ,पागलपन उन्मांद , मानसिक परेशानिया ,मानसिक रोग , शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाना .स्त्रिओं से सम्बंधित रोग , गर्भाशय के रोग , पुरुषों में अंडकोष से सम्बंधित रोग हो सकते है . जिनका चंद्र पीड़ित है ऐसे लोग अलसी भी होते है . किसी काम को समय पर पूरा नहीं करते ,कफ की वृद्धि हो सकती है , दमा ,कफ जन्य , आदि रोग भी चंद्र पीड़ित होने पर होते है .

मंगल – अगर जातक का  मंगल पीड़ित है मारक है तो उस जातक को उत्साह में कमी होगी . शरीर में गर्मी बानी रहती है ,ब्लड प्रेसर हाई हो जाता है .पित के विकार हो सकते है , छाती में जलन ,कोड, बार बार चोट लग्न घाव हो जाना , आग या किसी धार दार हथ्यार से घाव हो जाता है ,जो इन्फेक्शन का कारन भी बन सकता है ,कई गंभीर रोग जैसे चेचक , पलेग ,खसरा भी मगंल से पीड़ित जातक को हो सकते है .

बुध –  बुध के पीड़ित होने पर , चरम रोग हो जाता है , खुजली फोड़े फुंसियां ,दादादि रोग हो सकते है .दिमाग सही से काम नहीं करता , सर का भारीपन , मति भ्रमित हो जाती है .स्वास ,दमा ,बेहोश हो जाना भी बुध से देखा जाता है , बुध शरीर केस्नायु तंत्र , आंतरिक नाड़ी तंत्र और फेफड़ों को कण्ट्रोल करता है , यदि बुध अरिष्टकारक है तो इनसे सम्बंधित रोग हो सकते है .

गुरु – गुरु से दायां  कान , पाचन क्रिया ,  पेट की गैस से सम्बंधित रोग देखे जाते है .गुरु मारक होने पर आंत्र ज्वर ,हर्निया , अपेंडिक्स  ,कमर से जांघ तक जितने भी रोग है वो सब गुरु से देखे जाते है ,इसके इलावा ,शरीर की चर्बी ,मोटापा या दुबला पन ,भी बृहस्पति से विचार किया जाता है ,

शुक्र  – शुक्र ऐश्वर्य और  सोन्दर्ये का प्रतीक है .विलासिता से सम्बंधित जितने दुःख है वो सब शुक्र की श्रेणी में आते है .जैसे की मधुमेह ,वात रोग ,किडनी रोग ,काम वासना ,स्त्री और पुरुषों के गुप्र रोग ,स्वपन दोष leukorea  ,धातु रोग ,मूत्राशय सम्बंधित रोग ,आदि का विचार शुक्र देव से किया जाता है

शनि – घुटने .का दर्द ,हड्डी के जोड़ ,लीवर ,जिगर ,स्नायु दुर्बलता ,अधिक मेहनत  करना ,लकवा 
पक्षाघात , बालों की समस्या , हाथों और पैरों के नाखून ,कैंसर आदि रोगो का कारन शनि का पीड़ित होना हो सकता है .
राहु –  राहु के पीड़ित होने पर व्यक्ति नशे का आदि हो सकता है , छोटी छोटी बात में अपना आप खो सकता है .वायरस और कीटाणु जानिक जितने रोग है ,उनका विचार राहु से किया जाता है , पेट के कीड़े और विष्णु से उत्पन रोगो का कारन राहु देव हो सकते है .भूख न लग्न . पाचन संस्थान में गड़बड़ी .पेअर में चोट लगना भी राहु से विचार किया जाता है ..
केतु – जिस  महिला  का केतु पीड़ित होगा उसका गर्भपात बार बार होता है ,शफेद दाग , जिसे सफ़ेद कुष्ट कहते है उसका विचार भी केतु से किया जाता है ,चार्म रोग ,पेट में पानी भर जाना .फोड़ा फुंसी ,आदि विशदि रोगो का विचार भी केतु से किया जाता है ..

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